अध्याय 2. भोजन में क्या–क्या आता है?
भोजन के विभिन्न रूप हैं अर्थात् भोजन के अंतर्गत हम विभिन्न प्रकार के खाद्य–पदार्थ का उपभोग करते हैं। जैसे–भात, दाल, सब्जी, खिचड़ी, सत्तू, सलाद, फल, साग, हरी सब्जी इत्यादि भोजन के रूप में लेते हैं। भोजन के रूप में जितने भी खाद्य–पदार्थ का उपभोग करते हैं, उन भिन्न–भिन्न खाद्य–पदार्थों में भिन्न–भिन्न तरह के पोषक–तत्त्वों की मौजूदगी होती है। भिन्न–भिन्न तरह के पोषक–तत्त्वों की पूर्ति जब शरीर में होती है तो उसी के अनुरूप शरीर में ताकत एवं स्फूर्ति मिलती है। विभिन्न तरह के खाद्य–पदार्थों में किस–किस पोषक–तत्त्वों की मौजूदगी होती है? अथवा भोजन के अंतर्गत क्या सब आते हैं? इन्हीं सब विषयों पर विशद विश्लेषण इस ब्लॉग पोस्ट में किया गया है, कृपया ध्यानपूर्वक पढ़ें।
पोषक–तत्त्व (Nutrient)–
भोजन के अंतर्गत आने वाले समग्र खाद्य पदार्थ जिनसे शरीर का पोषण होता है अर्थात शरीर की वृद्धि, विकास एवं स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक होते हैं उन सभी खाद्य पदार्थ अथवा भोजन के अवयव को पोषक तत्व कहा जाता है।
हमारे भोजन के मुख्य पोषक तत्व के अंतर्गत कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन तथा खनिज लवण आते हैं इनके अलावा रेशा (रूक्षांश) तथा जल मौजूद होते हैं जो हमारे शरीर के लिए महत्वपूर्ण हैं।
खाद्य पदार्थ के अंतर्गत कच्ची खाद्य सामग्री या पके हुए भोजन का उपयोग किया जाता है। इन खाद्य पदार्थ में विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व उपस्थित होते हैं, जैसे– कार्बोहाइड्रेट की उपस्थिति मंड (starch) के रूप में होती है। खाद्य पदार्थ में पोषक तत्वों की उपस्थिति की जांच विभिन्न परीक्षण के द्वारा किया जाता है। खाद्य पदार्थ में उपस्थित विभिन्न तरह के पोषक तत्वों की जांच नीचे की गई है।
पोषक तत्व की जांच हेतु उपयुक्त सामग्री–
टिंक्चर आयोडीन, कॉपर सल्फेट, कास्टिक सोडा, परखनली, ड्रॉपर, जल, खाद्य–पदार्थ एवं विभिन्न प्रकार के घोल (विलयन) जिसे तैयार करने की विधि नीचे दर्शायी गई है।
घोल तैयार करने की विधि–
पोषक तत्व की परीक्षण हेतु आयोडीन का तनु घोल, कॉपर सल्फेट का घोल एवं कास्टिक सोडा का घोल की आवश्यकता होगी।
(i) आयोडीन का तनु घोल तैयार करना–
जल से आधी भरी हुई परखनली में ड्रॉपर की सहायता से 8–10 बूंद टिंक्चर आयोडीन मिलाने पर आयोडीन का तनु घोल बन जाता है।
(ii) कॉपर सल्फेट का घोल तैयार करना–
100 ml जल में 2 ग्राम कॉपर सल्फेट को घोलने पर कॉपर सल्फेट का घोल तैयार हो जाता है।
(iii) कास्टिक सोडा का घोल तैयार करना–
कास्टिक सोडा का घोल तैयार करने के लिए 10 ग्राम कास्टिक सोडा को 100ml जल में घोलें।
मंड की जांच :
मंड की जांच करने के लिए थोड़ी मात्रा में खाद्य पदार्थ/कच्ची सामग्री पर आयोडीन के तनु घोल को एक–दो बूंद डालें। खाद्य पदार्थ पर आयोडीन के तनु घोल के एक–दो बूंद को डालने पर यदि खाद्य पदार्थ के रंग में परिवर्तन होकर उसका रंग नीला या काला हो जाए तो खाद्य पदार्थ में परिवर्तन यह नीला या काला रंग मंड की उपस्थिति को दर्शाता है।
प्रोटीन की जाँच :
जिस खाद्य पदार्थ में प्रोटीन की उपस्थिति का जांच करना हो उस खाद्य पदार्थ को पीसकर या मसलकर उसका चूर्ण बना लें। खाद्य पदार्थ के इस चूर्ण को एक साफ परखनली में अल्प मात्रा में डाल दें। तत्पश्चात उस परखनली में ड्रॉपर की सहायता से 10 बूंद जल, 2 बूंद कॉपर सल्फेट का घोल एवं 10 बूंद कास्टिक सोडा का घोल डाल दें। परखनली को अच्छी तरह हिला कर कुछ मिनट के लिए रख दें ताकि परखनली के अंदर घोल एवं खाद्य पदार्थ अच्छी तरह मिलकर स्थिर हो जाए। कुछ देर के बाद परखनली में रखे खाद्य पदार्थ का रंग बैंगनी रंग का हो जाएगा। खाद्य पदार्थ का यह बैगनी रंग खाद्य पदार्थ में प्रोटीन की उपस्थिति को दर्शाता है।
वसा की जांच :
खाद्य पदार्थ की अल्प मात्रा को लीजिए और इसे एक छोटे कागज में लपेट कर कुटिये। ध्यान रखें कि कूटने के क्रम में कागज फटने न पाए। थोड़ी देर कूटने के बाद आराम से कागज को खोल कर सीधा करें और उस पर उपस्थित खाद्य पदार्थ को अलग कर दें। अब कागज को ध्यान पूर्वक देखें, उस कागज पर तेल का छोटा-छोटा धब्बा दिखाई देगा। कागज पर तेल का यह धब्बा खाद्य पदार्थ में वसा की उपस्थिति को दर्शाता है। यदि धब्बा दिखाई नहीं दे तो उस खाद्य पदार्थ में वसा की उपस्थिति नहीं होगी।
शरीर के लिए पोषक तत्व की जरूरत–
हमारे शरीर के लिए विभिन्न पोषक तत्व, जैसे– विटामिन, प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट आदि की जरूरत होती है। इन सभी जरूरतों की पूर्ति खाद्य पदार्थ से होती है। भिन्न भिन्न तरह के खाद्य पदार्थ में भिन्न-भिन्न तरह के पोषक तत्व मौजूद होते हैं। ऐसे बहुत सारे खाद्य पदार्थ हैं जिसमें दो या दो से अधिक पोषक तत्व मौजूद होते हैं। विभिन्न पोषक तत्वों का हमारे शरीर में क्या–क्या कार्य है चलिए जानते हैं–
कार्बोहाइड्रेट (carbohydrate) –
हमारे शरीर में कार्बोहाइड्रेट का मुख्य कार्य शरीर में उर्जा प्रदान करना है। शरीर में ताकत कार्बोहाइड्रेट के कारण ही मिलती है। कार्बोहाइड्रेट का मुख्य स्रोत– चावल, गेहूं, मक्का, गन्ना, बाजरा, आलू, शकरकंद, आम, पपीता आदि है। सबसे ज्यादा कार्बोहाइड्रेट चावल में मौजूद होते हैं।
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वसा (fats)–
वसा भी हमारे शरीर में ऊर्जा प्रदान करता है। कार्बोहाइड्रेट की अपेक्षाकृत शरीर में अधिक ऊर्जा वसा के द्वारा प्राप्त होती है। अतः वसा और कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन को ‘ऊर्जा देने वाला भोजन’ भी कहे जाते हैं। वसा के स्रोत– सूरजमुखी तेल, नारियल तेल, सरसों तेल, सोयाबीन तेल, मूंगफली तेल, गिरि, घी आदि हैं अर्थात इन सभी खाद्य पदार्थों में वसा प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
प्रोटीन (protein)–
हमारे शरीर की वृद्धि के लिए प्रोटीन बहुत आवश्यक पोषक तत्व है। साथ ही प्रोटीन शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं। प्रोटीन के मुख्य स्रोत– पनीर, दूध, मटर, मूंग, तुअर, चना, सोयाबीन, राजमा, मांस, मछली, अंडा इत्यादि हैं।
विटामिन (vitamin)–
हमारे शरीर के रोगों से रक्षा करने के लिए विटामिन सहायक होते हैं। विटामिन हमारे आंखों, हड्डियों, दांतों और मसूड़ों को स्वस्थ रखते हैं।
विटामिन विभिन्न प्रकार के होते हैं जिन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है। जैसे– विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी, विटामिन डी, विटामिन बी, और विटामिन के। विटामिन का एक खास समूह है, जिन्हें ‘विटामिन बी कॉम्प्लेक्स’ के नाम से जाना जाता है। हमारे शरीर में इन सभी विटामिंस की जरूरत होती है।
विटामिन–ए –
विटामिन–ए हमारे शरीर की त्वचा और आंख को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं। विटामिन–ए की कमी से रतौंधी नामक रोग होता है। विटामिन–ए के मुख्य स्रोत हैं– गाजर, दूध, पपीता, आम, मछली तेल आदि।
- रतौंधी नामक रोग में दूसरे व्यक्ति की अपेक्षाकृत रोगी को कम दिखाई पड़ता है या अंधेरे में बिल्कुल भी दिखाई नहीं पड़ता।
- बच्चों में यदि विटामिन–ए की बहुत कमी हो जाए तो वह बच्चा हमेशा के लिए अंधा हो सकता है।
- प्रायः पीले रंग के गूदेदार फल में विटामिन–ए पाया जाता है।
विटामिन–बी –
विटामिन–बी हमारे शरीर की पेशियों को मजबूत बनाता है एवं शरीर में ऊर्जा की पूर्ति करता है। शरीर में विटामिन–बी की कमी होने से ‘बेरी–बेरी’ नामक रोग उत्पन्न हो जाता है। विटामिन–बी का मुख्य स्रोत– गेहूं, चावल, यकृत आदि है।
विटामिन–सी –
विटामिन–सी हमारे शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है अर्थात रोगों से लड़ने में हमारी मदद करता है। विटामिन–सी की कमी से ‘स्कर्वी’ नामक रोग उत्पन्न हो जाता है। विटामिन–सी का मुख्य स्रोत– आंवला, नींबू, संतरा, टमाटर, अमरूद, मिर्ची आदि है।
विटामिन–डी –
हमारे शरीर में हड्डियों (अस्थियों) और दांतो को मजबूत बनाने के लिए कैल्शियम सहायक होते हैं। विटामिन–डी कैल्शियम का उपयोग करने में हमारे शरीर की सहायता करता है। विटामिन–डी की कमी से ‘रिकेट्स’ नामक रोग हो जाता है। विटामिन–डी का मुख्य स्रोत– दूध, मक्खन, अंडा, कलेजा, मछली आदि है।
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खनिज लवण (mineral salts)–
हमारे शरीर में खनिज लवणों की आवश्यकता अल्प मात्रा में होती है। खनिज लवण विभिन्न प्रकार के होते हैं। हमारे शरीर का उचित विकास और अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रत्येक प्रकार के खनिज लवण आवश्यक हैं।
खनिज लवण के प्रकार–
खनिज लवण मुख्यतः पांच प्रकार के होते हैं– सोडियम, कैलशियम, पोटैशियम, मैग्निशियम और फास्फोरस। इनके अतिरिक्त लोहा, आयोडीन, मैग्नीज, तांबा, जस्ता, क्रोमियम ये सब भी खनिज लवण के ही प्रकार हैं। हमारे शरीर को लौह तत्व की प्राप्ति हरी सब्जियां विशेषकर पालक, मेथी तथा केला से होती हैं। उसी तरह फास्फोरस और कैल्शियम की प्राप्ति मछली, अंडा इत्यादि से होती है। कैल्शियम का मुख्य स्रोत दूध है। शरीर में सोडियम और पोटेशियम की पूर्ति नमक से होती है।
रूक्षांश (आहारी रेशा)–
रूक्षांश हमारे शरीर के लिए किसी भी प्रकार का पोषक तत्व नहीं है। फिर भी यह शरीर के लिए बहुत उपयोगी अवयव है। रूक्षांश बिना पचे हुए भोजन को हमारे शरीर से बाहर निकालने में सहायक होते हैं। रूक्षांश को ‘आहारी रेशा’ भी कहा जाता है। हमारे भोजन में आहारी रेशे की पूर्ति मुख्यतः पादप उत्पादों जैसे– अंकुरित खाद्यान्न, दाल, आलू, ताजे फल और सब्जियां आदि से होती है। अनाज के चोकर से भी रूक्षांश की प्राप्ति होती है।
जल (water) –
हमारे शरीर के द्वारा भोजन में मौजूद पोषक तत्व का अवशोषण होता है। जल इन पोषक तत्वों को अवशोषण करने में हमारी मदद करता है। आवश्यकता से कम मात्रा में जल लेने पर शरीर द्वारा पोषक तत्वों का अधिग्रहण ठीक ढंग से नहीं हो पाता है। जल हमारे अंदर के विकारों को, अपशिष्ट पदार्थों को पसीने व मूत्र के साथ बाहर निकालता है। शरीर में जल की पूर्ति के लिए हम सामान्यतः भौमजल (जैसे–ट्यूबवेल, नलकूप, कुआं आदि) का सदैव अधिग्रहण करते हैं। इनके अलावा द्रव रूप में जितने भी खाद्य पदार्थ हैं उसमें मौजूद जल से भी हमारे शरीर में जल की पूर्ति होती है। जैसे– चाय, कॉफी, दूध फल का रस आदि।
ताजे फल या सब्जी में मौजूद जल से भी हमारे शरीर में जल की पूर्ति होती है। कुछ खाद्य पदार्थों को जल के साथ पकाते हैं या पकाते समय उसमें जल चला जाता है। इस खाद्य पदार्थों को ग्रहण करने से भी हमारे शरीर में जल की पूर्ति होती है।
संतुलित आहार (balance food)–
सामान्यतः पूरे दिन में हम जो कुछ भी खाते हैं, उसे आहार कहा जाता है।
ऐसा आहार (भोजन) जिसमें पोषक तत्व की मौजूदगी न हीं अधिक मात्रा में और न हीं कम मात्रा में होनी चाहिए अर्थात उचित मात्रा में होने चाहिए, साथ ही रूक्षांश और जल भी पर्याप्त मात्रा में होने चाहिए, ऐसे आहार को संतुलित आहार कहे जाते हैं।
हमारे शरीर में संतुलित आहार शारीरिक कार्य अथवा मानसिक कार्य पर निर्भर करता है। ज्यादा श्रम करने वाले व्यक्ति को श्रम नहीं करने वाले व्यक्ति की अपेक्षाकृत ज्यादा मात्रा में संतुलित आहार लेने की आवश्यकता होती है। ज्यादा मानसिक कार्य करने वाले व्यक्ति को भी ज्यादा मात्रा में संतुलित आहार की जरूरत होती है। कोई व्यक्ति कम खर्च में भी संतुलित आहार ले सकता है।
जैसे– दाल, मूंगफली, सोयाबीन, अंकुरित बीज, खमीर उठा भोजन, आटे के बने व्यंजन, केला, पालक, सत्तू, गुड़ आदि में उचित मात्रा में पोषक तत्व मौजूद होते हैं। यह सभी खाद्य पदार्थ संतुलित आहार के अंतर्गत आते हैं।
कच्ची खाद्य सामग्री को आवश्यकता से अधिक पका देने पर उसमें मौजूद पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जैसे– पकाने पर ज्यादा गर्मी के कारण भोजन में मौजूद विटामिन–सी नष्ट हो जाते हैं। अतः कच्ची खाद्य सामग्री को उचित तरीके से पकाना चाहिए। सब्जियों और फलों के छिलकों में महत्वपूर्ण विटामिंस एवं खनिज लवण मौजूद होते हैं। छिलका उतारकर यदि सब्जियों और फलों को धोया जाता है तो उसमें मौजूद विटामिन कुछ मात्रा में नष्ट हो जाते हैं चावल और दाल को बार-बार धोने से उसमें मौजूद विटामिंस और खनिज लवण कुछ मात्रा में नष्ट हो जाते हैं।
कुपोषण (malnutrition)–
जब शरीर को संतुलित भोजन नहीं मिल पाता अर्थात शरीर को आवश्यक मात्रा में पोषक तत्वों की पूर्ति नहीं हो पाती तो इस स्थिति को कुपोषण कहा जाता है।
संतुलित भोजन नहीं मिलने पर अर्थात कुपोषण की स्थिति होने पर शरीर में मरासमस (सूखा रोग) नामक रोग उत्पन्न हो जाता है। यह रोग अधिकतर बच्चों में दिखाई देते हैं। बच्चे को संतुलित भोजन नहीं मिलने पर या कम भोजन मिलने पर प्रोटीन तथा कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम मिलती है, जिससे बच्चा काफी कमजोर व दुबला–पतला हो जाता है। छाती में पसली की हड्डियां भी दिखाई देने लगती है।
यदि किसी बच्चे को भोजन में अन्य सभी पोषक तत्व मिले लेकिन प्रोटीन कम मिले अथवा नहीं के बराबर मिले तो उस बच्चे में क्वाशियोरकर नामक रोग उत्पन्न हो जाता है।
- क्वाशियोरकर नामक रोग में रोगी का पेट फुला हुआ दिखाई देता है, साथ ही हाथ–पैर भी फूला हुआ दिखाई देने लगता है।
- बच्चा काफी कमजोर और दुबला–पतला हो जाता है एवं छाती में पसली की हड्डी भी दिखाई देने लगती है।
अतिपोषण (overnutrition)–
ज्यादा मात्रा में वसा युक्त खाद्य पदार्थ ग्रहण करने पर शरीर में मोटापा बढ़ने लगता है, इस स्थिति को अतिपोषण कहा जाता है
अधिक मात्रा में तली हुई खाद्य सामग्री, समोसा, पूरी–मलाई, रबड़ी, पेड़ा आदि खाने पर शरीर अतिपोषण का शिकार हो जाता है अर्थात् मोटापा बढ़ने लगती है।
अभावजन्य रोग (deficiency disease)–
यदि लंबे समय तक पोषक तत्व युक्त खाद्य पदार्थ को ग्रहण नहीं किया जाए तो इस पोषक तत्व के अभाव के कारण शरीर में एक रोग उत्पन्न हो जाता है, जिसे अभावजन्य रोग कहते हैं।
- यदि भोजन में लगातार पर्याप्त प्रोटीन नहीं मिले तो उस भोजन को ग्रहण करने वाले व्यक्ति में इस प्रकार के अभावजन्य रोग हो जाएंगे– वृद्धि में रुकावट हो जा, चेहरे पर सूजन, बालों के रंग का उड़ना, त्वचा की बीमारी, पेचिश आदि।
- यदि किसी व्यक्ति के भोजन में लगातार प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट नहीं मिले तो उस व्यक्ति की वृद्धि पूरी तरह रुक जाएगी। ऐसा व्यक्ति बिल्कुल दुबला पतला हो जाएगा। इतना कमजोर हो जाएगा कि वह चलने में भी असमर्थ होगा।
- यदि किसी व्यक्ति को भोजन के अंतर्गत लंबे समय तक विटामिन और खनिज लवण नहीं मिले तो वह विभिन्न अभाव जन्य रोगों से ग्रसित हो जाएगा।
- अभाव जन्य रोगों से बचने के लिए अथवा इसके रोकथाम के लिए संतुलित आहार लेने चाहिए।
दूषित भोजन (contiminated food)–
हानिकारक सूक्ष्मजीव युक्त खाद्य पदार्थ को दूषित भोजन कहा जाता है।
मक्खियां विभिन्न जगहों पर बैठती है एवं वहां से हानिकारक सूक्ष्मजीवों को अपने साथ लाकर जिस खाद्य पदार्थ पर बैठती है वह खाद्य पदार्थ दूषित हो जाता है। भोजन को सदैव ढंक कर रखना चाहिए अन्यथा वह हानिकारक सूक्ष्म जीव से संस्पर्श होने पर दूषित हो सकता है। दूषित खाद्य पदार्थ में खटास हो जाती है एवं वह दुर्गंध युक्त हो जाता है। ऐसा खमीर (किण्वन) उठने के कारण होता है। कुछ ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जिसमें खमीर (किण्वन) लाभदायक होते हैं, जैसे– जलेबी, भटूरा, मालपुआ, इडली, डोसा, पावरोटी आदि।
गर्मी के दिनों में पका हुआ भोजन जल्दी खराब हो जाता है, क्योंकि गर्मी के कारण किण्वन तीव्र होता चला जाता है। दूषित जल पीने पर अतिसार जैसी बीमारी उत्पन्न होने लगती है। दूषित जल से भोजन पकाने पर भोजन भी दूषित हो जाता है। दूषित भोजन बहुत सारी बीमारियों का मूल जड़ है। अतः दूषित खाद्य पदार्थ से बचना चाहिए।
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